कब्र पर
जिस श्याम को ढून्ढ रहे हो
वह तो कब की ढल चुकी है
जिस शमा की आस लगाए हुए हो
वह तो कब की बुझ गयी है
दीवानगी में खोटा सौदा कर बैठे
हिसाब न लगा पाए कभी
उम्र गुज़ार दी कब्र पर बैठ कर
की शायद वह उठ जाए कभी
दफनाए हुए को बेडफन करोगे
तो फखत मिटटी ही न पाओगे
दफन मिटटी में हो कोई बदन
या गुज़रे वक़्त के तेरे हो धड़कन
गुज़रा वक़्त कभी लौट के नहीं आता
मिटटी में सोया जो, वह मिटटी ही बन जाता है
यह हकीकत है, कोई कहानी नहीं
ज़हन में लेले इसे, अबयही तुझसे इल्तेजाः है
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