Yeh Shor O Gul ka Sama
यह शोरो गुल का समा, यह सोलों का छाया आसमान में काफिला शोहरत का बदनुमा दिखावा, अजीबो गरीब यह चलता हुआ सिलसिला जलाता उड़ाता हर कोई है आज, कोई कम कोई थोड़ीसी ज्यादा जितनी हैसियत, उतनी शोर, और उतना खुदगर्जी फायदा डरे सहमे से जानवर, दुबक के गाड़ियों के नीचे छुपते हुए हैरान परेशान आंखों में हजारों सवाल पूछते हुए और भूखे पेट कुछ इंसान, इस तमाशे को देखते हुए कमाया न जिसे कभी, देखते हैं आज उसे जलते हुए यह शोरो गुल का समा, यह सोलों का छाया आसमान में काफिला...