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Rusva kiya

नज़रों में न थी, ख्यालों में जब थी  कितनी करीब थी, कितनी अपनी थी  मुह्हबत था, महसूस था  माँगा न था, पर सपना था  उम्मीद न था, पर सुकून था  ज़हन वाक़िफ़ था, हकीकत क़ुबूल था  फिर एक रोज़, तुम नज़र आयी  दिल की तस्वीर टूटी, और ओझल होने लगी  जितनी तुम करीब हुई, रेट फिसलने लगी  हकीकत बदला, सपने ख़त्म हुए  आशियाँ था दिल का, टूटा और बह गया  जब धड़का न था, तुम्हारा दिल  शिक़वा न था, क़सम से  अब यह नफरत, और यह ज़िल्लत  खुदा कसम, मुशक्किल है बहुत  दिल काबिल न था, मगर धड़कन तो सुना तूने  फिर कैसे यकीन किया, की मैंने तुमको धोखा दिया  जो सबसे ज़्यादा कीमती, उसीको रुसवा किया