सब तुम्हारा
यह धरती तुम्हारी, यह आसमान तुम्हारा
पानी, पवन और मिटटी, सब तुम्हारा
कितना और बांटोगे, कितना और काटोगे
हर तलवार तुम्हारी, हर खंजर तुम्हारा
अब रुक भी जाओ, थक भी जाओ
यहां ज़िन्दा हर सांस भी तुम्हारा
जी लो हर पल, बनो किसीका सहारा
मिटटी का हर टुकड़ा भी तुम्हारा
किस रूहानियत से नाम खुदा का लेते हो
उतने ही शिद्दत से खून इंसान का बहते हो
कहते हो जीने का हक़ नहीं उसको
मानो शैतान ने पैदा किया हो उसको
धरती पर यह तांडव रचाते हो
क़यामत में हूर की उम्मीद रखते हो
पलक झपकते ज़िन्दगी गुज़र जाती है
प्यार समेटने में उम्र बीत जाती है
नफरत का समंदर जो रक्खे फिर रहे हो,
अपने सीने में आखिर कैसे समाते हो
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