यूँ ही फिर रहा हूँ

यूँ ही फिर रहा हूँ आवारा आज मैं
साथ कुछ सूखे पत्ते भी उड़ रहे हैं

मुझे मेरा मन और उन्हें हवा
दोनों आवारा, दोनों को उड़ा रहे हैं

न कोई मंज़िल न कोई राह
मैं चला जहाँ क़दम चल पड़े हैं

न कोई आह न कोई चाह
आज तो बस रास्ते में जी रहे हैं

कहीं आवाज़ कहीं सन्नाटा
हर आहट का मज़ा ले रहे हैं

कहीं रोशनी तो कही अंधेरा
हर पल में सवेरा देखते जा रहे हैं

सबको देखते हुए सब को सुनते हुए
यूं ही आवारा आज फिर रहे हैं

मन मेरा माझी कायनात समंदर
कभी तन को लगे कभि छूके लहर गुज़र रहे हैं

कभी बावला लगे तो कभी शरीर
कभी अपने कभी मीलों दूर लग रहे हैं

यूं ही फिर रहा हूँ आवारा आज मैं
यूँ ही बस कुछ ख़याल आ रहे हैं

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