गुरूर
गर एहसास न हो अपने गुनाहों का
तो बेक़सूर कहाँ कहलाऊंगा?
गर मान भी जाऊँ दिललगी मे
तो कुसूरवार कहाँ साबित हो जाऊँगा?
मुझे तुझ पे यकीं है और
तुझे मेरे गुनाहों पर
कितना हसीन भरोसा है
कितना गहरा प्यार है
गर सोच लें कि दोनों बेगुनाह है
क्या तेरा जाएगा क्या मेरा?
थोड़ा सा ग़ुरूर टूट जाएगा
और थोड़ी सी क़द घट जाएगी
ये तो बस एक ख़याल है
मेरे सोचने से क्या तू बदल जाएगा?
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